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19-Sep-2026 11:11 AM
साप्ताहिक आधार पर गिरते-उठते खरीफ फसलों का बिजाई क्षेत्र अब पंचवर्षीय औसत क्षेत्रफल के अत्यन्त करीब पहुंच गया है लेकिन अल नीनो मौसम चक्र के प्रकोप एवं कमजोर मानसून के कारण कई क्षेत्रों में फसलों की हालत उत्साहवर्धक या संतोषजनक नहीं देखी जा रही है। चालू माह की वर्षा पिछैती बिजाई वाली फसलों के लिए संजीवनी का काम कर सकती थी मगर बारिश की हालत अच्छी नहीं है। अब देश से दक्षिण-पश्चिम मानसून के प्रस्थान करने का समय शुरू हो गया है।
यदि अपनी विदाई यात्रा के दौरान मानसून बारिश की सौगात प्रदान कर दे तो खरीफ फसलों को नया जीवनदान मिल सकता है। दक्षिण भारत के सभी राज्यों में मूसलाधार बारिश की सख्त आवश्यकता महसूस की जा रही है जबकि महाराष्ट्र, गुजरात एवं राजस्थान जैसे प्रांतों के कुछ भागों में भी लम्बे समय से अच्छी वर्षा नहीं हुई है जिससे किसानों की चिंता बढ़ गई है।
खरीफ फसलों का उत्पादन क्षेत्र गत वर्ष से 15.05 लाख हेक्टेयर पीछे चल रहा है जिसमें मुख्यतः धान का योगदान है। इसका क्षेत्रफल 16.64 लाख हेक्टेयर घट गया है। मक्का की बिजाई भी 2.12 लाख हेक्टेयर पीछे चल रही है। दलहन फसलों में सिर्फ मूंग को छोड़कर अन्य फसलों-उड़द, तुवर एवं मोठ का रकबा गत वर्ष से आगे हो गया है।
मोटे अनाजों में भी ज्वार एवं बाजरा के बिजाई क्षेत्र में अच्छी बढ़ोत्तरी हुई है। तिलहन फसलों में तिल एवं सूरजमुखी का क्षेत्रफल बढ़ा है मगर सोयाबीन, मूंगफली एवं अरंडी का घट गया है। इसी तरह कपास एवं गन्ना जैसी औद्योगिक फसलों के क्षेत्रफल में भी कमी आई है। कुल मिलाकर बिजाई की स्थिति सामान्य है लेकिन मौसम एवं मानसून की हालत देखते हुए उत्पादन के प्रति चिंता बनी हुई है।