थोक मंडी भाव ऊंचा होने से सरसों की सरकारी खरीद बहुत कम
10-Apr-2026 02:00 PM
नई दिल्ली। प्रमुख उत्पादक राज्यों की महत्वपूर्ण थोक मंडियों में सरसों का भाव न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) से ऊंचा चल रहा है इसलिए किसान सरकारी एजेंसियों के बजाए व्यापारियों / स्टाकिस्टों को अपना उत्पाद बेचने में ज्यादा दिलचस्पी दिखा रहे हैं। पश्चिम एशिया संकट के कारण खाद्य तेलों के महंगा होने से तिलहनों के दाम में तेजी-मजबूती का माहौल बना हुआ है। भारत दुनिया में खाद्य तेलों का सबसे प्रमुख आयातक देश हैं इसलिए अंतर्राष्ट्रीय बाजार में खाद्य तेलों की कीमतों में होने वाले परिवर्तन का भारतीय बाजार पर सीधा असर पड़ता है।
व्यापारियों / स्टाकिस्टों को भरपूर सरसों मिलने से मिलर्स- प्रोसेसर्स को इसकी खरीद में कठिनाई नहीं हो रही है और इसलिए सरसों की क्रशिंग- प्रोसेसिंग की गति काफी तेज चल रही है।
किसानों को अपने उत्पाद (सरसों) की बिक्री से अच्छी आमदनी हो रही है। सरसों तेल का उत्पादन बेहतर होने से पाम तेल, सोयाबीन तेल एवं सूरजमुखी तेल के आयात पर निर्भरता में कमी आ रही है।
देश के सबसे प्रमुख सरसों उत्पादक प्रान्त- राजस्थान के अग्रणी व्यापारिक केन्द्र- भरतपुर में इस महत्वपूर्ण तिलहन का भाव बढ़कर 7000 रुपए प्रति क्विंटल के आसपास पहुंच गया है जो सरकारी समर्थन मूल्य 6200 रुपए प्रति क्विंटल से काफी ऊंचा है। ऐसी हालत में किसान सरकारी एजेंसियों को अपना उत्पाद क्यों बेचना चाहेंगे ?
मूल्य समर्थन योजना (पीएसएस) के अंतर्गत नैफेड एवं हैफेड जैसी सरकारी एजेंसियों एमएसपी से ऊंचे दाम पर कृषि उत्पादों की खरीद नहीं करती है।
राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, हरियाणा, पश्चिम बंगाल एवं गुजरात जैसे शीर्ष उत्पादक प्रांतों साथ-साथ उत्पादक राज्यों की मंडियों में भी सरसों की भरपूर आवक हो रही है और इसका दाम भी मार्च के आरंभ से अब तक करीब 9 प्रतिशत बढ़ चुका है।
सरसों का मार्केटिंग सीजन मार्च से आरंभ माना जाता है। मरुधर ट्रेडिंग एजेंसी, जयपुर के प्रबंध निदेशक- अनिल चतर का कहना है कि सरसों तेल एवं रेपसीड मील- दोनों की मांग मजबूत होने से क्रशिंग में पड़ता बैठ रहा है।
