दलहन बाजार में गतिशीलता

29-Nov-2025 10:52 AM

खरीफ कालीन दलहनों के उत्पादन में गिरावट आने का अनुमान सामने आने के बावजूद कीमतों में गतिशीलता का बरकरार रहना उत्पादकों की दृष्टि से शुभ संकेत नहीं है क्योंकि उसके उत्साह एवं आकर्षक में कमी आ सकती है।

केन्द्र सरकार के आंकड़ों से पता चलता है कि पिछले साल के मुकाबले 2025-26 के खरीफ मार्केटिंग सीजन के दौरान अरहर (तुवर) का उत्पादन 36.24 लाख टन से फिसलकर 35.97 लाख टन टन, उड़द का 13.41 लाख टन से घटकर 12.05 लाख टन तथा मूंग का उत्पादन 17.74 लाख टन से गिरकर 17.20 लाख टन पर सिमट सकता है।

पहले कमजोर उत्पादन का घरेलू बाजार पर गहरा मनोवैज्ञानिक असर पड़ता था और दलहनों की कीमतों में तेजी की गुंजाईश रहती थी लेकिन जब से आयात की उदारवादी नीति का प्रचलन शुरू हुआ है तब से भारतीय दलहन बाजार वैश्विक बाजार के उतार-चढ़ाव से प्रभावित और संचालित होने लगा है।

दो वर्ष पूर्व तक देसी चना एवं पीली मटर के आयात पर क्रमश: 60 प्रतिशत एवं 50 प्रतिशत का भारी-भरकम मौलिक सीमा शुल्क लगा हुआ था जिससे घरेलू बाजार भाव पर कम दबाव पड़ रहा था। लेकिन बाद में सरकार ने दिसम्बर 2025 में पीली मटर तथा मई 2024 में देसी चना के आयात को शुल्क मुक्त कर दिया।

इसका नतीजा यह हुआ कि वित्त वर्ष 2024-25 के दौरान भारत में दलहनों का कुल आयात तेजी से उछलकर 70 लाख टन से भी आगे निकलकर सर्वकालीन सर्वोच्च स्तर पर पहुंच गया। तुवर, उड़द एवं मसूर का आयात पहले ही शुल्क मुक्त हो चुका था।

इस रिकॉर्ड आयात के कारण घरेलू प्रभाग में दाल-दलहनों की आपूर्ति एवं उपलब्धता काफी बढ़ गई और कीमत घटकर नीचे आ गई। विभिन्न पक्षों की ओर से किए गए जोरदार आग्रह के बावजूद सरकार ने देसी चना एवं मसूर पर महज 10-10 प्रतिशत का तथा पीली मटर पर 30 प्रतिशत का आयात शुल्क लगाया जबकि तुवर और उड़द के शुल्क मुक्त आयात को बरकरार रखा है। 

अब रबी कालीन दलहनों की बिजाई चल रही है और इसके कुल क्षेत्रफल पर सबकी निगाहें केन्द्रित हैं। पिछले सप्ताह तक चना, मसूर एवं मटर का उत्पादन  क्षेत्र गत वर्ष से कुछ आगे चल रहा था। चना का भाव न्यूनतम समर्थन मूल्य के आसपास या उससे नीचे आ गया है।

ऑस्ट्रेलिया से आयातित चना भी सस्ता बैठ रहा है। अगर सरकारी नीति में बदलाव नहीं हुआ तो आगामी समय में भी दलहन बाजार में गतिशीलता बढ़ने की संभावना कम रहेगी जिससे किसानों को दलहनों की खेती पर पछतावा हो सकता है। दलहनों के वैश्विक उत्पादन में इजाफा होने से भाव नरम पड़ गया है।