दलहनों के आयात का परिदृश्य हो रहा है जटिल
08-Dec-2025 01:19 PM
नई दिल्ली। भारत में विदेशों से दलहनों के आयात का परिदृश्य दिनों दिन जटिल होता जा रहा है। केंद्र सरकार एक तरफ घरेलू उत्पादन में भारी बढ़ोत्तरी करके देश को दलहनों में आत्मनिर्भर बनाने का जोरदार प्रयास कर रही है तो दूसरी ओर म्यांमार, मोजाम्बिक और मालावी जैसे देशों से दलहन आयात के लिए किए गये पंचवर्षीय समझाते (करार) की समय सीमा को अगल पांच साल तक बढाने की तैयारी भी कर रही है।
उल्लेखनीय है कि भारत सरकार ने पांच साल पूर्व इन तीनों देशों के साथ अलग-अलग करार किया था जिसके तहत प्रत्येक वर्ष म्यांमार से 2.50 लाख टन उड़द एवं 1.00 लाख टन तुवर, मोजाम्बिक से 2.00 लाख टन तुवर तथा मालावी से 50 हजार टन तुवर के आयात की प्रतिबद्धता व्यक्त की गयी थी। यदि इस करार की समयावधि आगे बढ़ाई जाती है तो इसका मतलब यह होगा कि भारत में अगले पांच साल तक प्रत्येक वर्ष इन तीन देशों से कम से कम 6 लाख टन दलहन का आयात अवश्य होगा। इसके अलावा ऑस्ट्रेलिया से 1.50 लाख टन मसूर के आयात का करार भी हो चुका है। म्यांमार, मोजाम्बिक एवं मालावी से किए गये करार की अवधि चालू वित्त वर्ष के अंत में यानी 31 मार्च 2026 तक समाप्त हो जाएगी। लेकिन उससे पूर्व ही इसकी समय सीमा वित्त वर्ष 2030-31 तक बढ़ाने की घोषणा हो चुकी है। संयोग से भारत ने 'दलहनों में आत्मनिर्भरता मिशन' के अंतर्गत देश को वर्ष 2030-31 तक दलहनों के उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाने का लक्ष्य निर्धारित किया है।
फ़िलहाल देसी चना एवं मसूर पर 10-10 प्रतिशत तथा पीली मटर पर 30 प्रतिशत का आयात शुल्क लगा हुआ है जबकि तुवर एवं उड़द का आयात बिल्कुल शुल्क मुक्त है। इसके अलावा देश में राजमा, लोबिया एवं काबुली चना का भी सीमित आयात होता है। दलहनों के उत्पादन एवं आयात से सम्बंधित सरकारी नीति में भारी विर्धाभास देखा जा रहा है। समझा जाता है कि म्यांमार एवं दोनों अफ्रीकी देशों से दलहन आयात के पंचवर्षीय करार की समय सीमा को आगे बढ़ाने के प्रस्ताव को अंतरमंत्रालयी समीति की स्वीकृति प्राप्त हो चुकी है।
