दलहन उत्पादन में आत्मनिर्भरता के लिए मजबूत आधार आवश्यक
01-Apr-2025 04:56 PM
नई दिल्ली। पिछले साल केन्द्रीय सहकारिता मंत्री ने दावा किया था कि भारत 2027 तक दाल-दलहन के उत्पादन में पूरी तरह आत्मनिर्भर हो जाएगा और वर्ष 2028 से देश में विदेशों से 1 किलो दलहन भी मंगाने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। लेकिन संयोग से उसी वर्ष दलहन का आयात बढ़कर नए रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया।
सरकार ने तुवर एवं उड़द के शुल्क मुक्त आयात की समय सीमा 31 मार्च 2026 तक बढ़ा दी है और देसी चना तथा मसूर पर भी महज 10-11 प्रतिशत का आयात शुल्क लगाया है।
लेकिन कृषि मंत्रालय के अनुसार दलहनों का घरेलू उत्पादन 2024-25 के सीजन में घटकर 230 लाख टन पर अटकने का अनुमान है जो 2021-22 सीजन के रिकॉर्ड उत्पादन 273 लाख टन से 15 प्रतिशत कम है।
2021-22 में दलहन फसलों का कुल बिजाई क्षेत्र 307 लाख हेक्टेयर के करीब रहा था जो 2024-25 के सीजन में 17 प्रतिशत गिरकर 255 लाख हेक्टेयर पर अटक गया। इसमें खरीफ, रबी तथा जायद- तीनों सीजन का रकबा शामिल है।
बेशक सरकार दलहनों के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) में नियमित रूप से अच्छी वृद्धि कर रही है लेकिन इससे किसानों को उत्पादन बढ़ाने का अपेक्षित प्रोत्साहन नहीं मिल रहा है
क्योंकि एमएसपी पर सरकारी खरीद अक्सर देर से तथा सीमित मात्रा में होती है। कुछ राज्यों में किसानों का रुझान दलहनों के बजाए अन्य फसलों की तरफ बढ़ रहा है।
दलहन उत्पादन में आत्मनिर्भरता का लक्ष्य लगातार दूर होता जा रहा है जो सरकार के लिए गंभीर चिंता का विषय है। पिछले तीन वर्षों के दौरान उड़द का उत्पादन क्षेत्र 46 लाख हेक्टेयर से 41 प्रतिशत लुढ़ककर 27 लाख हेक्टेयर पर सिमट गया।
यद्यपि 2023-24 की तुलना में 2024-25 सीजन के दौरान तुवर के बिजाई क्षेत्र में 1.6 प्रतिशत, चना के क्षेत्रफल में 3.7 प्रतिशत तथा मूंग के रकबे में 7 प्रतिशत का इजाफा हुआ मगर फिर भी यह क्षेत्रफल 2021-22 के मुकाबले बहुत नीचे रहा।
अप्रैल-दिसम्बर 2024 में दलहनों का आयात बढ़कर 48.60 लाख टन पर पहुंचा जो अप्रैल- दिसम्बर 2023 के आयात 28 लाख टन से 78 प्रतिशत अधिक रहा। विशाल आयात को बंद करना निकट भविष्य में संभव नहीं लगता है।
