बेमौसमी वर्षा का असर
01-Nov-2025 10:50 AM
भारतीय किसानों को चालू वर्ष के दौरान शानदार कृषि उत्पादन की उम्मीद थी क्योंकि एक तो मानसून के जल्दी आने तथा विभिन्न इलाकों में अच्छी वर्षा होने से खरीफ फसलों की अगैती बिजाई में सहायता मिली और दूसरे, धान, मक्का, उड़द तथा कुछ अन्य फसलों के क्षेत्रफल में अच्छा इजाफा भी हुआ।
जुलाई-अगस्त के दौरान दक्षिण-पश्चिम मानसून कुछ राज्यों में अत्यन्त सक्रिय रहा और सितम्बर में भी इसकी जोरदार सक्रियता जारी रही। मानसूनी वर्षा का पैटर्न बदल रहा है।
पहले देश के पश्चिमोत्तर को आमतौर पर सूखाग्रस्त इलाका माना जाता था और वहां बारिश कम होती थी जिससे राजस्थान, पंजाब एवं हरियाणा तथा गुजरात को भी फसलों की सिंचाई के लिए भूमिगत जल पर आश्रित रहना पड़ता था लेकिन इस बार इतनी जोरदार बारिश हुई कि अधिकांश भाग जल मग्न हो गया और बाढ़ की विभीषिका बहुत बढ़ गई।
इतना ही नहीं बल्कि अक्टूबर में जब फसलों की कटाई-तैयारी आरंभ हुई तब बारिश का दौर शुरू हो गया। इससे कई इलाकों में फसलें क्षतिग्रस्त हो गईं और शानदार खरीफ उत्पादन की उम्मीदों पर पानी पड़ गया।
अत्यन्त मूसलाधार वर्षा और भयंकर बाढ़ के प्रकोप से महाराष्ट्र कर्नाटक एवं तेलंगाना में भी फसलें प्रभावित हुई जिससे लाखों किसानों का सपना हकीकत में बदलने से पहले ही चकनाचूर हो गया।
पिछले दिनों आए मोंथा समुद्री चक्रवाती तूफान ने भी दक्षिणी राज्यों में तबाही मचाई और खरीफ फसलों को बर्बाद कर दिया। महाराष्ट्र में भी बेमौसमी वर्षा का प्रतिकूल असर पड़ा।
प्राकृतिक आपदाओं से यूं तो लगभग सभी खरीफ फसलें प्रभावित हुई मगर सोयाबीन, कपास एवं दलहन फसलों को सबसे ज्यादा नुकसान होने की आशंका है। इससे कृषि विकास की गति धीमी पड़ने की संभावना है।
फसलों की बर्बादी से किसानों को कर्ज चुकाने में कठिनाई होगी और ग्रामीण अर्थ व्यवस्था कमजोर पड़ेगी जिससे देहाती इलाकों में खपत पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। इसका असर एफएमसीजी कंपनियों के कारोबार पर पड़ने की आशंका है।
केन्द्र सरकार द्वारा सैकड़ों उपभोक्ता उत्पादों पर जीएसटी दर में कटौती किए जाने से उसकी मांग एवं खपत में बढ़ोत्तरी होने की उम्मीद की जा रही थी लेकिन किसानों की क्रय शक्ति कमजोर रहने पर खपत बढ़ने में संदेह रहेगा। कृषि क्षेत्र की हालत उत्साहवर्धक नहीं मानी जा सकती है।
