दाल-दलहन के थोक एवं खुदरा मूल्य में अंतर रहना स्वाभाविक

17-Jul-2024 04:11 PM

नई दिल्ली । केन्द्र सरकार ने खुदरा कारोबारियों से कहा है कि दालों पर लाभ का मार्जिन कम रखे ताकि आम उपभोक्ताओं को कुछ राहत मिल सके। इस सम्बन्ध में यह ध्यान रखना दिलचस्प है कि सरकार एक महत्वपूर्ण तथ्य को नजरअन्दाज कर रही है।

वस्तुतः दली दालों का खुदरा मूल्य उसके निर्माण लागत पर आधारित होता है और वह उत्पादन खर्च कच्चे माल यानी साबुत दलहनों के दाम पर निर्भर करता है।

कच्चे माल साबुत दलहन की खरीद और बाजार में प्रोसेस्ड (दली) दालों की आपूर्ति के बीच करीब 30 दिनों का अंतर रहता है।

यदि साबुत दलहनों के थोक बाजार भाव में कोई गिरावट आती है तो भी दली दालों की कीमतों पर यह एक माह के अंतराल में प्रतिबिम्बित हो पाएगी और वह भी तब, जब दलहनों का थोक बाजार भाव कुछ समय तक स्थिर रहे। यदि इसमें तेजी-मंदी आती है तो दली दालों के दाम पर उसका असर दिखाई पड़ेगा।

दलहन और दाल का दाम एक दिशा में चल सकता है। अब दालों के थोक बाजार भाव एवं खुदरा मूल्य के बीच अंतर होने का कारण समझना आवश्यक है।

इस बात (दलील) से सहमत होना मुश्किल है कि रिटेल काउंटर एवं होल सेल काउंटर पर प्रचलित दालों के दाम में विरोधाभासी प्रकृति देखी जा रही है।

यह सही है कि एफएमसीजी के फार्मेट में बेचीं जाने वाली पैकिंग युक्त ब्रांडेड दाल का भाव लम्बे समय तक एक निश्चित सीमा में स्थिर रखा जा सकता है इसलिए ऐसे मामलों में कुछ हद तक विरोधाभासी रुख बनना संभव है।

एक प्रसिद्ध कहावत है कि यदि सही ढंग से उपचार नहीं किया गया तो बीमारी कभी पूरी तरह खत्म नहीं होगी।

 सरकार का कहना है कि पिछले एक महीने के दौरान दलहनों (तुवर, उड़द एवं चना) के थोक बाजार मूल्य में करीब 4 प्रतिशत की गिरावट आई मगर दालों के खुदरा मूल्य में उसके अनुरूप कमी नहीं आ सकी जिस पर रिटेलर्स को ध्यान देना चाहिए।