यूरोपीय संघ के बाजार से बांग्ला देशी वस्त्र निर्यातकों का संकट बढ़ेगा
02-Feb-2026 02:48 PM
ढाका। भारत और यूरोपीय संघ के बीच हुए द्विपक्षीय करार से बांग्ला देशी वस्त्र निर्यातकों के लिए गंभीर संकट उतपन्न होने की आशंका है। पिछले सप्ताह हुआ यह करार वर्ष 2027 से पूरी तरह प्रभावी होने की उम्मीद है। इस समझौते को "सभी करारों की जननी" (एमडीआर ऑफ ऑल डील्स) कहा गया है। इसके प्रभावी होने के बाद यूरोपीय संघ में भारतीय वस्त्र परिधानों का व्यापर तेजी से बढ़ेगा और वहां बांग्लादेश के निर्यातको के लिए भारत की चुनौती का सामना करना आसान नहीं होगा। .
यूरोपीय संघ के विशाल बाजार हासिल होने से भारतीय निर्यातकों को अमरीकी बाजार पर निर्भरता थमने में सहायता मिलेगी। जहां भारत के वस्त्र उत्पादकों पर 50 प्रतिशत का भारी भरकम आयात शुल्क लगाया गया है अमरीकी वस्त्र परिधान बाजार में पहले से ही बांग्ला देश को चीन, पाकिस्तान, दक्षिण कोरिया, थाईलैंड एवं वियतनाम सहित कुछ अन्य देशो की कठिन प्रर्तिस्पर्धा का सामना करना पड़ रहा है।
यूरोपीय संघ में भारत से रेडीमेड गारमेंट्स एवं अन्य वस्त्र उत्पादों का मूल्य प्रर्तिस्पर्धी स्टार पर रहता है मगर ऊंचे सिमा शुल्क के कारण कभी कभार इसका निर्यात प्रभावित हो जाता है।
दिलचस्प तथ्य यह है कि मिलर्समान समय में यूरोपीय संघ में बांग्लादेश से भी वस्थ उत्पादों का शुल्क मुक्त निर्यात हो रहा है मगर इसकी अवधि केवल तीन वर्षो के लिए नियत की गई है। बांग्लादेश को सबसे कम विकसित देश की श्रेणी का मानते हुए यूरोपीय संघ ने उसे शुल्क युक्त निर्यात की छूट दी थी। अगर तीन वर्षो में कोई नया करार नहीं हुआ तो वर्ष 2029 से उसके वस्त्र उत्पादों पर 12.5 प्रतिशत का शूल लागु हो जाएगा।
