ग्लेशियर के तेजी से पिघलने से फसलों की सिंचाई पर भविष्य में खतरा
24-Mar-2025 08:41 PM
नई दिल्ली। हिमाचल क्षेत्र में ग्लेशियर (हिमपात) भारत में अनेक नदियों के लिए जल का प्रमुख स्रोत है मगर ये हिमपात तेजी से पिघलते जा रहे हैं।
इसके फलस्वरूप नदियों का जलस्तर घटने तथा कृषि क्षेत्र में उत्पादकता प्रभावित होने का खतरा है। चूंकि ग्लोबल वार्मिंग में कमी आने का कोई संकेत नहीं मिल रहा है और जलवायु परिवर्तन की संभावना बढ़ती जा रही है
इसलिए भारतीय किसानों को अपने प्राकृतिक संसाधनों का इस्तेमाल काफी सोच-समझकर करना होगा ताकि राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा को भविष्य में कोई खतरा न हो।
कृषि वैज्ञानिकों तथा अनुसंधान केन्द्रों के विभिन्न फसलों के ऐसे उन्नत बीज के विकास पर ज्यादा जोर देना होगा जो गर्मी को अधिक से अधिक सहन कर सके और जिसे पानी की कम आवश्यकता पड़े।
खेती के तौर-तरीकों में भी बदलाव किए जाने की जरूरत है। यह बदलाव जितनी जल्दी शुरू हो जाए उतना ही अच्छा है।
उल्लेखनीय है कि भारत का कृषि क्षेत्र दक्षिण-पश्चिम मानसून पर काफी हद तक निर्भर रहता है। जून से सितम्बर के चार महीनों तक सक्रिय रहने वाले इस मानसून सीजन के दौरान देश में करीब 70 प्रतिशत सालाना वर्षा होती है और इससे नदियों को भी पानी प्राप्त होता है।
लेकिन ग्लेशियर के पिघलने से निकलने वाला पानी प्रमुख नदियों को साल भर पानी प्रदान करता है। देश में लगभग 70 प्रतिशत कृषि क्षेत्र में या यूं कहें कि धान, गन्ना एवं कपास आदि फसलों की खेती करने वाले लाखों किसानों को फसलों की सिंचाई के लिए इन ग्लेशियर से निर्मित पानी की आवश्यकता पड़ती है।
यदि नदियों का जल स्तर घटा तो बांधों जलाशयों के सूखने का खतरा बढ जाएगा जो कृषि उत्पादन के लिए खतरनाक साबित हो सकता है।
