शुष्क क्षेत्रों में फसलों की उत्पादकता में भारी गिरावट आने की आशंका
31-Mar-2025 07:46 PM
नई दिल्ली। जलवायु परिवर्तन तथा पर्यावरण प्रदूषण के प्रकोप से शुष्क भूमि वाले क्षेत्रों में खेतों की मिटटी की उर्वरा शक्ति लगातार कमजोर पड़ती जा रही है। संक्षेप में कहें तो सूखी जमीन भूखी और प्यासी होती जा रही है।
एक अग्रणी संस्था- इंटरनेशनल क्रॉप्स रिसर्च इंस्टीट्यूट फॉर सेमी एरिड ट्रांपिक्स (इक्रीसेंट) के महानिदेशक ने कहा है कि यदि शुष्क भूमि की भूख एवं प्यास मिटाने का तत्काल भरसक प्रयास नहीं किया गया तो अगले 25 साल में यानी वर्ष 2050 तक वहां अधिकांश फसलों की उत्पादकता दर में 25 से 30 प्रतिशत तक की गिरावट आ सकती है।
इन क्षेत्रों में जल्दी से जल्दी नए विज्ञान एवं नई प्रोद्योगिकी के साथ हस्तक्षेप करने की सख्त आवश्यकता है। जलवायु परिवर्तन एवं ग्लोबल वार्मिंग के कारण तापमान में बढ़ोत्तरी हो रही है।
भारत एक विशाल कृषि प्रधान देश है लेकिन यहां आधी से अधिक कृषि योग्य भूमि आसमानी वर्षा पर आश्रित है। मानसून की हालत अनिश्चित और नियमित रहती है।
इससे देश के कुछ भागों में अत्यन्त मूसलाधार बारिश एवं भयंकर बाढ़ का प्रकोप रहता है तो कुछ अन्य क्षेत्रों में ऊंचे तापमान के साथ मौसम शुष्क बना रहा है।
इस शुष्क क्षेत्र में जमीन की उर्वरता काफी घट जाती है और उसमें फसलों का उत्पादन प्रभावित होता है। तापमान एवं वर्षा को नियंत्रित करना संभव नहीं है लेकिन विज्ञान एवं तकनीक के सहारे इसके दुष्प्रभाव को काफी हद तक रोका जा सकता है।
पहली बात तो यह है कि देश के अधिक से अधिक भाग में सिंचाई सुविधाओं का विकास विस्तार होना चाहिए और वर्षा जल के संरक्षण की भरपूर कोशिश की जानी चाहिए।
इसके साथ-साथ फसलों की ऐसी नई एवं उन्नत किस्मों का विकास होना चाहिए जिसमें प्रतिकूल मौसम को बर्दाश्त करने की ज्यादा से ज्यादा क्षमता मौजूद हो और उसकी उपज दर पर इसका कोई असर न पड़े।
फसलों की ऐसी प्रजातियों का विकास होना भी आवश्यक है जो कम समय में एक बार तैयार हो जाए और जिसे पानी की कम से कम जरूरत पड़े।
मौसम एवं वर्षा की दृष्टि से आने वाला समय अनिश्चित है इसलिए उस पर भरोसा करने तथा हाथ पर हाथ रख कर बैठने के बजाए संभावित समस्या के निराकरण पर जोर देने की आवश्यकता है।
