भारतीय कपास क्षेत्र को बाहरी से ज्यादा अंदरूनी कारकों से खतरा
07-Apr-2025 08:24 PM
अहमदाबाद। ट्रम्प प्रशासन के रेसिप्रोकल टैरिफ से भारतीय कपास उद्योग को नुकसान के बजाए फायदा होने की ज्यादा उम्मीद है क्योंकि कॉटन टेक्सटाइल उत्पादों पर अमरीका में भारत के बजाए अन्य आपूर्तिकर्ता देशों पर ऊंचे स्तर का आयात शुल्क लगाया गया है।
अमरीका में भारतीय सूती वस्त्रों पर 26 प्रतिशत का सीमा शुल्क लगेगा जबकि वियतनाम उत्पादों पर 46 प्रतिशत, श्रीलंकाई वस्त्र उत्पादों पर 44 प्रतिशत, बांग्ला देशी कॉटन उत्पादों पर 37 प्रतिशत, चाइनीज कपड़ो पर 34 प्रतिशत, इंडोनेशियाई वस्त्रों पर 32 प्रतिशत तथा पाकिस्तानी कॉटन प्रोडक्ट्स पर 30 प्रतिशत का टैरिफ वसूला जाएगा इस तरह भारतीय निर्यतकों को कम टैक्स का फायदा मिलेगा।
लेकिन भारतीय कॉटन उद्योग के लिए घरेलू कारक और खासकर मई के उत्पादन में आने वाली गिरावट ज्यादा चिंता की वजह बना हुआ है। केन्द्रीय कृषि मंत्रालय ने अपने दूसरे अग्रिम अनुमान में 2024-25 सीजन के दौरान कपास का घरेलू उत्पादन घटकर 294 लाख गांठ (170 किलो की प्रत्येक गांठ) पर सिमट जाने की संभावना व्यक्त की है
जो 2008-09 सीजन के उत्पादन 290 लाख गांठ के बाद का सबसे निचला स्तर है। कपास उत्पादन एवं उपयोग समिति ने भी इसी तरह का अनुमान लगाया है।
उल्लेखनीय है कि भारत में 2013-14 के सीजन में कपास का उत्पादन उछलकर 398 लाख गांठ के सर्वकालीन सर्वोच्च स्तर पर पहुंच गया था जबकि उसके बाद एक दशक की अवधि के दौरान उत्पादन में 104 लाख गांठ की जबरदस्त गिरावट आ गई।
उत्पादन में इतनी भारी गिरावट आना कॉटन क्षेत्र के लिए खतरे की घंटी है। इससे न केवल रूई का निर्यात बुरी तरह प्रभावित हो रहा है बल्कि कॉटन उत्पादों के निर्यात पर भी असर पड़ रहा है।
वर्ष 2002-03 में जब देश के नौ राज्यों (बाद में 10 प्रांतों) में बीटी कॉटन की व्यावसायिक खेती की अनुमति दी गई थी तब देश में महज 136 लाख गांठ कपास का उत्पादन हुआ जो अगले 10-11 वर्षों में लगभग तीन गुणा बढ़कर 398 लाख गांठ पर पहुंच गया।
इसी तरह 2002-03 से 2013-14 के बीच रूई का निर्यात 80 हजार गांठ से 139 गुना उछलकर 117 लाख गांठ नए ऐतिहासिक रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया। इसके बाद एक तरफ निर्यात में जोरदार कमी आने लगी तो दूसरी ओर आयात बढ़ने लगा।
2024-25 के वर्तमान सीजन में भारत से करीब 17 लाख गांठ रूई का निर्यात होने की उम्मीद है जबकि देश में इसका आयात बढ़कर 30 लाख गांठ की ऊंचाई पर पहुंच जाने का अनुमान है। भारतीय कपास क्षेत्र के लिए यह स्थिति सुखद नहीं है।
