चावल के अधिशेष उत्पादन को देखते हुए तेलंगाना में फसल विविधिकरण पर जोर

18-Jun-2026 05:44 PM

हैदराबाद। दक्षिण भारत के सबसे प्रमुख चावल उत्पादक राज्य- तेलंगाना में अब फसल विविधिकरण की सख्त आवश्यकता महसूस की जा रही है। पिछले कुछ वर्षों के अंदर इस राज्य में धान-चावल के उत्पादन में जोरदार इजाफा  हुआ है और इसके अधिशेष स्टॉक की समस्या एक गंभीर चुनौती बन गई है। वर्ष 2014 में जब आंध्र प्रदेश से अलग होकर तेलंगाना एक नए राज्य के तौर पर अस्तित्व में आया था तभी से वहां धान की खेती में किसानों का जबरदस्त उत्साह एवं आकर्षण देखा जा रहा है। 

सीजन दर सीजन चावल के बढ़ते उत्पादन को मैनेज करने में सरकार को भारी कठिनाई होने लगी है। तेलंगाना ऐसे गिने-चुने प्रांतों में शामिल है जहां खरीफ सीजन के साथ-साथ रबी सीजन के दौरान भी धान की खेती बड़े पैमाने पर होती है और चावल का विशाल उत्पादन होता है। 

पिछले एक दशक के दौरान तेलंगाना में चावल का उत्पादन करीब तीन गुणा बढ़ गया। 2013-14 के सीजन में वहां करीब 66 लाख टन धान का उत्पादन हुआ था जो 2024-25 तक आते-आते उछलकर 170 लाख टन पर पहुंच गया। पहले तेलगाना मुख्यतः वर्षा पर आश्रित राज्य माना जा रहा था

लेकिन बाद में वहां कुछ बड़े बांधों-जलाशयों का निर्मण किया गया जिससे धान की खेती के लिए पर्याप्त पानी उपलब्ध होने लगा। वर्तमान समय में तेलंगाना देश के तीन शीर्ष धान-चावल उत्पादक राज्यों की सूची में शामिल है। कुल राष्ट्रीय उत्पादन में यह राज्य लगभग 12 प्रतिशत का योगदान दे रहा है। 

समीक्षाधीन अवधि के दौरान तेलंगाना में धान का रकबा भी 19.95 लाख हेक्टेयर से उछलकर 47 लाख हेक्टेयर पर पहुंच गया। मौजूदा समय में वहां धान का सम्पूर्ण उत्पादन क्षेत्र सिंचित है।

सिंचाई की नई-नई परियोजनाओं के पूरा होने तथा मानसून की अच्छी वर्षा होने से किसानों की दिलचस्पी हमेशा धान की खेती में बनी रहती है। लेकिन धान की औसत उत्पादकता दर काफी हद तक स्थिर देखी जा रही है। 

अब तेलंगाना में कपास तथा मक्का का रकबा भी बढ़ गया है लेकिन दलहन-तिलहन, गन्ना एवं अन्य मोटे अनाजों की खेती सीमित क्षेत्र में ही हो रही है। इसका क्षेत्रफल बढ़ाने की जरूरत पर जोर दिया जा रहा है।